तू ही लक्ष्मी तू ही सरस्वती
तू ही लक्ष्मी तू ही सरस्वती
और तू दुर्गा भवानी।
जग ने जानी तेरी अमर कहानी,
सबने मानी तेरी अमर कहानी ।।
तू ही राष्ट्र भवन निर्माता,
तू ही वीर प्रसूता माता।
बल, विद्या और वैभव
में तू ही लासानी।।
जग ने-तेरा विख्यात है कारनामा,
जग में मच गया था हंगामा।
रण में निकल पड़ी जब,
दुश्मन हो गया पानी-पानी।। जग ने-
तू ही बच्चों को वीर बनाती,
कुश्ती शेरों से उनकी कराती
दे-दे के लोरियाँ बनाती
देशभक्त बलिदानी।। जग ने-
तुझ में पतिव्रत धर्म है निराला,
पापियों का किया मुंह काला।
किरणमयी अकबर के सीने
पर कटार ले तानी ।। जग ने-
तुझ में माता का प्यार अनूठा,
जिसके आगे सकल प्यार झूठा ।
तेरा दूध पीकर के माता,
नहीं रहता वो छानी ।। जग ने-
याद आती है पद्मावती की,
सीता साध्वी सावित्री सती की।
निज सतीत्व के बल पति को
जीवित करने की ठानी।। जग ने-
तुझ में बहती है प्रेम की धारा,
जलता कोध का भी अंगारा
छुपी हुयी तेरे आँसू में,
एक प्रलय तूफानी ।। जग ने-










