जिस घर में हो प्यार
जिस घर में हो प्यार,
हो पितरों का सत्कार ।
खुश रहते हों नरनार,
वह घर कितना सुन्दर है।।
है शील और लज्जा,
जिन देवियों का गहना।
उस गहने के मुकाबिल,
शृंगार कोई है ना।।
जिस घर में पाप छल से,
आती न हो कमाई।
विष के समान समझे,
जो सम्पदा पराई ।।
स्वस्थ तन हो श्रेष्ठ
मन हो आवें सुविचार ।।
जिस घर में यज्ञ पाँचों,
करते हो सारे मिल के
देते सुगन्ध सब को,
फूलों की भाँति खिल के।
प्रेम बरसे चित्त हरसे,
बहती हो सुख की धार।।
आपस में बोलते हों जिस घर
में मीठी बोली कटुता का अंत
होवे और कपट की होली ।
घर वहीं पर है जहाँ पर,
हों मधुर समान विचार ।।










