कुल की परम्परा मर्याद,निभाये जाना बेटी।

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कुल की परम्परा मर्याद,निभाये जाना बेटी।

कुल की परम्परा मर्याद,
निभाये जाना बेटी।
तुम सास-ससुर घर जाओ,
मत रोवो हमें रुलाओ।
अपने बचपन का संसार,
भुलाये जाना बेटी ।।

तुम सुबह-सवेरे जगना,
सब कार्य समय पर करना।
उत्तम भोजन कर तैयार,
खिलाये जाना बेटी ।।

तुम सास-ससुर का कहना,
नित मानिये मेरी बहना।
घर में हो तेरा सम्मान,
हर्षाये जाना बेटी ।।

मत फैशन में फंस जाना,
मत फूहड़पन दिखलाना।
उत्तम गृहणी का श्रृंगार,
कराये जाना बेटी ।।

जो घर आ जाये गरीबी,
तो धर्म न तजना बीबी।
हिम्मत से घर का हर काम,
चलाये जाना बेटी ।।

जो दे प्रभु सम्पत्ति भारी,
तो गर्व न करना प्यारी।
अपने देश-धर्म हित दान,
दिलाये जाना बेटी ।।

मत पत्थर पूजा करना,
मत भूत प्रेत से डरना
घर में संध्या-हवन प्रचार,
कराये जाना बेटी ।।

यह शिक्षा सार बताया,
सुख होगा अगर निभाया।
सबको “शीतल” कवि के गीत,
सुनाये जाना बेटी ।।