आया खिजां में बहार बन के

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आया खिजां में बहार बन के

आया खिजां में बहार बन के,
ऋषि दुःखिया दिलों
की पुकार बनके ।।

जब देश तिमिर में देखा,
किश्ती को भंवर में देखा,
ज्ञानी भी बने अज्ञानी,
स्वामी की नजर ने देखा।
धरती पे बेकार भार बन के,
छली छलते थे होशियार बन के ।।

पद दलित हुये थे,
भाई मजबूरन बने
ईसाई नाते अटूट टूटे,
क्या बात नहीं दुखदाई
तड़पा ऋषि बेकरार बनके,
और आंसू बहे गंगधार बनके ।।

सोने की चिड़िया भारत,
स्वारथ ने कर दिया गारत
हर मतवादी ने की है,
मनमानी हंस शरारत दुःखियों
के दुःख का आधार बनके,
आया रहबर यतिवर हमार बनके ।।