उपकार कैसे भूलें ऋषि दयानन्द का

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उपकार कैसे भूलें ऋषि दयानन्द का

उपकार कैसे भूलें ऋषि दयानन्द का
उस योगी का
तपस्वी का आनन्द कन्द का…।।

जीवन का दान दे गया,
अमृत पिला गया मल्लाह
बन कर डूबती नैया बचा गया।
सन्देश उसका काम देता
है कमन्द का… ।।

उसके हरेक शब्द में,
इक आग थी भरी हर
एक को सुनाता था,
सच्ची खरी-खरी।
दिल डरता था कभी न,
उस न्याय पसंद का …।।

आया ज्यों ही मैदान में,
इक शोर सा उठा
मुखालफत की आंधी का,
इक जोर सा उठा।
पांव न डगमगाया,
उस हिम्मत बुलन्द का …।।

रोता था उजड़े देश की,
गुरूबत को देख कर
विधवा अनाथों अछूतों की,
हालत को देख कर।
क्या-क्या सुनाऊं हाल,
दिले दर्द मन्द का ….।।

लड़ता है लेकिन,
हाथ में तलवार भी नहीं
दुश्मन जमाना सारा,
कोई मददगार भी नहीं।
देखा अजब करिश्मा,
उस वैदिक सन्त का..।।