वो कौन आया चौंक उठी
वो कौन आया चौंक उठी,
ये दुनियां जिसकी बात से
वेद की पोथी हाथ में लेकर,
निकला था गुजरात से ।।
घोर घटायें छायी थीं,
मानवता मुरझाई थी
पाखंडियों ने ढोंग रचाकर,
खूब करी मनचाही थी वैदिक
पथ का सूरज निकला,
टंकारा गुजरात से ।।
शूद्र यहां पर रोते थे,
रोज विधर्मी होते थे
धर्म के ठेकेदार यहां पर,
बीज फूट के बोते थे।
सबको गले लगाकर,
तोड़े बन्धन जात-पांत के ।।
क्या कहिये उस आने को,
आया था समझाने को प्यार
किया था प्यारे ऋषि ने
हर अपने-बेगाने को।
विष के प्याले पिये “सुरेन्द्र”
जाति तेरे हाथ से ।।










