ऋषि दयानन्द का फसाना।

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ऋषि दयानन्द का फसाना।

ऋषि दयानन्द का फसाना।
समझा ना समझा नहीं जमाना ।।
नसीहत ऋषि की अगर मान लेते,
तो अपनों को अपनों से प्यार होता
रहम के फरिश्ते को पहचान लेते,
तो खुशियों में डूबा यह संसार होता।
मगर उसको दुश्मन ही जाना….समझा ना ।।

आने को आये बहुत सन्त-स्वामी,
खड़े कर गये पन्थ मत न्यारे-न्यारे
दयानन्द था वेद के पथ का गामी,
सभी उसके तर्क और दलीलों से हारे।
कहा धर्म वैदिक पुराना…. समझा ना ।।

सौराष्ट्र की धरती पर जन्म लेकर,
बन कर रहा था वह सारे जहां का
भक्तों ने पूछा बड़ा जोर देकर,
किसी को बताया नहीं मैं कहां का।
मन था प्रभु का दीवाना …… समझा ना ।।

अरस्तु क्या सुकरात शंकर से ज्ञानी,
अपने समय के थे चिन्तक निराले
निष्पक्ष कर्मठ दयानन्द का सानी,
मिलना नहीं वन नगर खोज डाले।
सच्चाई का था वो दीवाना …. समझा ना ।।