ऋषि दयानन्द आये जगाने
ऋषि दयानन्द आये जगाने,
फिर भी न जग पाये
तुम्हें क्या हो गया है।।
वेद भाषा पढ़ के,
ज्ञान फैलाया सारे जहान
में लुटेरों की पोल खोली
रख करके ऋषिवर ने ध्यान में।
घर घर अलख जगाई जाकर,
तनिक नहीं घबराये…..।।
विधवा अनाथों का हामी,
वह हमदर्द था चोटी जनेऊ कैसे बचे,
दिल में उसके दर्द था।
मुल्ला पोप-पुजारी पण्डे,
उत्तर न दे पाये….।।
अकेला था योगी,
एक ओर सब संसार था
किसी से न बैर करता था,
करता सबसे प्यार था।
सतपथ के दर्शाने वाला
भूषण यूं समझाये….।।










