काहे भूला ओम नाम मन रे
काहे भूला ओम नाम मन रे,
ये मेला दो दिन का रट
उसे सुबह-शाम मन रे,
ये मेला दो दिन का ।।
सुबह को बचपन हंसते देखा,
फिर दो पहर जवानी
पहर तीसरा समझ बुढ़ापा,
शाम को खत्म कहानी।
आयी मौत ले के शाम
मन रे ये मेला दो दिन का ।।
हरी शाख पर कली गुलाबी,
खिलने भी ना पायी
खिलते-खिलते टूट गयी,
इक ऐसी आंधी आयी।
मिला उजड़ा मुकाम
मन रे ये मेला दो दिन का ।।
इक दिन पहले सिंहासन को,
सजा रहे नर-नारी दिन
निकला मिल गयी फकीरी,
हुई वन की तैयारी।
चले लखन, सिया राम वन
में ये मेला दो दिन का ।।
देख के अपना रूप रंगीला,
फिरता फूला-फूला ये
जीवन बेमोल है तेरा,
पानी जैसा बबूला ।
जले रक्त हाड़-चाम-मन
रे ये मेला दो दिन का ।।










