अशरण-शरण दया के धाम

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अशरण-शरण दया के धाम

अशरण-शरण दया के धाम,
एक सहारा तेना नाम ।
तूही भ्राता मात-पिता है,
तू ही सद्‌गुरु महासखा है।
तू ही पथ दर्शक सच्चा है,
परम हितैषी ! तुझे प्रणाम।।

जप-तप विधि का ज्ञान नहीं है,
शास्त्र ज्ञान का भान नहीं है।
दुनियां की पहिचान नहीं है,
मुझे बताओ सही मुकाम।।

भटक-भटक कर देख चुका हूँ,
अपनों से ही ठगा गया हूँ।
हर प्रकार से हार चुका हूँ,
मुझे सहारा दो निष्काम।।

तुम न सुनोगे कौन सुनेगा,
मेरी विपदा कौर हरेगा।
भव से तूही पार करेगा,
सोम तुम्हीं हो आशा धाम ।।

तीन कार्यों से बड़प्पन मिलता है-
अपनी प्रशंसा आप न करने से,
दूसरों की निन्दा न करने से,
दुखी को देखकर न हंसने
से बड़प्पन मिलता है।