वेदों का डंका आलम में

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वेदों का डंका आलम में

वेदों का डंका आलम में,
बजवा दिया ऋषि दयानन्द ने।
हर जगह ओ३म् का झंडा फिर,
फहरा दिया ऋषि दयानन्द ने।।

अज्ञान अविद्या की हर सू,
घनघोर घटाएँ छाई थीं।
कर नष्ट उन्हें जग में प्रकाश,
फैला दिया ऋषि दयानन्द ने।।

सिर पर तूफान बला का था,
नजरों से दूर किनारा था।
बनकर मल्लाह किनारे पर,
पहुंचा दिया ऋषि दयानन्द ने।।

घुस गये लुटेरे घर में थे,
सब माल लूटकर ले जाते।
सद शुक्र हाथ सोतों का पकड़,
बिठला दिया ऋषि दयानन्द ने।।

मक्कारी दगा फरेबी से जो
माल मुफ्त का खाते थे।
सब पोल खोलकर दिल उनका,
दहला दिया ऋषि दयानन्द ने।।

सब छोड़ चुके थे धर्म-कर्म,
गौरव गुमान ऋषि मुनियों का।
फिर संध्या हवन-यज्ञ करना,
सिखला दिया ऋषि दयानन्द ने।।

बलिदान किया बलिवेदी पर,
जीवन ‘प्रकाश’ हंसते-हंसते ।
सच्चे रहबर बनकर सबको,
दिखला दिया ऋषि दयानन्द ने।।