जरा आ शरण में तू ओम् की
जरा आ शरण में तू ओम् की,
मेरा ओम् करूणानिधान है।
कण-कण में रमा हुआ,
पत्ते पत्ते में, विद्यमान है।।
ऋषि-मुनि पा इसको तर गये,
योगी भी झोलियां भर गये।
अन्त नेति नेति हैं कह गए,
ये नाम इतना महान् है।।
इस नाम से तू लगा लगन,
दिन-रात इसमें तू हो मगन।
तुझे शक्ति इक मिल जायेगी,
ये नाम मुक्ति का धाम है।।
ये नाम इतना महान् है,
इसमें भरा विज्ञान है।
लहर-लहर करती गान है,
मेरे ओम् का ही नाम है।।
इस नाम में इतना असर,
दुःख दर्द पीड़ा का न डर।
इच्छा पूर्ण हो तेरी प्रभु,
मेरे देवता का प्रमाण है।।










