त्याग-तपस्या से पवित्र-परिपुष्ट हुआ

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त्याग-तपस्या से पवित्र-परिपुष्ट हुआ

त्याग-तपस्या से पवित्र-परिपुष्ट हुआ
जिसका ‘तन’ है,
भद्र-भावना-भरा स्नेह-संयुक्त
शुद्ध जिसका ‘मन’ है।


होता व्यय नित-प्रति परहित में,
जिसका शुचि संचित ‘धन’ है,
वही श्रेष्ठ-सच्चा ‘मानव’ है,
धन्य उसी का ‘जीवन’ है।