पूर्वा संध्यां जपंतिष्ठ नैशमनो व्यपोहति ।
पूर्वा संध्यां जपंतिष्ठ नैशमनो व्यपोहति ।
पश्चिमां तु समासीनो मलंहन्त दिवाकृतम ।।
प्रातः काल की संध्या
में एकासन से बैठ जप करता हुआ
मनुष्य रात्रि में किये हुए
पापों को नष्ट करता है,
तथा सायं काल की संध्या
में बैठकर जप करता हुआ
मनुष्य दिन में किये हुए
पापों को नष्ट करता है।










