ओ३म् नाम प्रिय बोल रे।

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ओ३म् नाम प्रिय बोल रे। (तर्ज घूंघट के पट खोल रे)

ओ३म् नाम प्रिय बोल रे।
तुम्हें शान्ति मिलेगी।
चहुं दिशि प्रभु की ज्योति निरखले,
ज्ञान चक्षु को खोल रे।। तुम्हें…

धर्म, कर्म, की हाट लगा ले,
पूरा-पूरा तोल रे। तुम्हें…
दम्भ, द्वेष, छल, स्वार्थ को त्याग दे,
प्रेम प्रीति रस घोल रे। तुम्हें …

शुभकर्मों से नर तन पाया,
मिट्टी में मत रोल रे। तुम्हें…
हृदय मन्दिर में वास प्रभु का,
ज्ञान की आँखे खोल रे। तुम्हें…

विषयों में मत खो ‘प्रकाश’ तू,
मानुष तन अनमोल रे। तुम्हें…