मेरा ऋषि वो, जग में था न्यारा

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मेरा ऋषि वो, जग में था न्यारा

तर्ज – तेरी जवानी तपता महीना…..

मेरा ऋषि वो, जग में था न्यारा,
आँखों का तारा। कभी भी किसी से,
किया ना किनारा, आँखों का तारा ॥

कई बार प्याला, विष का पिलाया,
काँच खिलाया “सचिन” महर्षि को,
दे दिया पारा, आँखों का तारा
मेरा ऋषि वो……….

जब तक रहेगी, काली घटा ये,
ज़मीं आसमाँ ये तब तक दिलों में,
रहेगा वो प्यारा, आँखों का तारा
मेरा ऋषि वो……

वेदों का पढ़ना, और पढ़ाना,
सुनना-सुनाना धर्म ये ऋषि ने,
परम उच्चारा, आँखों का तारा
मेरा ऋषि वो………

वेदों का रस्ता, हमको दिखाया,
जीना सिखाया छीना दीवाली ने,
दीपक हमारा, आँखों का तारा
मेरा ऋषि वो……….