तर्ज – इक परदेशी मेरा दिल…
कौन हमें वेद का ये ज्ञान दे गया।
देव दयानन्द वो महान दे गया।।
आके जिस देवता ने,
हमको बचाया था पारा
उस देवता को, “सचिन”
खिलाया था खुद को
मिटाके हमें प्राण दे गया
देव दयानन्द वो……
वाणी परमात्मा की,
वेद को बताता था
रोज़ वेद मंत्रों से,
यज्ञ को रचाता था
जीने की कला वो हमें
दान दे गया देव दयानन्द वो……
मंज़िल दूर थी,
रास्ता मुहाल था
कहाँ वो छुपा है प्रभु,
सामने सवाल था
प्रभु की ऋषि वो
पहचान दे गया
देव दयानन्द वो……
छाया हुआ चहुँ ओर,
घोर अन्धकार था
किया दयानन्द ने,
वेद का प्रचार था वेद का
हमें वो एक भान दे गया
देव दयानन्द वो……..










