रचना प्रभु की ये, क्या लाजवाब है।

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रचना प्रभु की ये, क्या लाजवाब है।

तर्ज – चौदवीं का चाँद हो (गज़ल)

रचना प्रभु की ये, क्या लाजवाब है।
निश में कमर सितारें, और आफताब है।

हर शय से है वो ज़ाहिर,
उसको तू जान ले दिल में
वो वास करता, ये बात मान ले रे
क्यूँ सचिन ‘सारंग’ ओढ़ा
नकाब है रचना प्रभु की……..

उसको ना देख सकती,
नादाँ तेरी नज़र ना देख तू सकेगा,
आँखों से ओ बशर मालिक है
वो सभी का, रंक चाहे नवाब है
रचना प्रभु की……….

सागर हो या हो झीलें,
वो सब में है रमा शीतल
पवन की सर-सर,
में वो ही तो छुपा अग्नि है
ये उसी की, उसका ही
आब है रचना प्रभु की……….