आँच ना कोई भी आये, मेरे वतन को।

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आँच ना कोई भी आये, मेरे वतन को।

तर्ज – पंछी बनूं उड़ती फिरूँ…….

आँच ना कोई भी आये, मेरे वतन को।
खून से सींचा है इस, प्यारे चमन को ।
वन्दे मातरम-4

याद आती है ‘सचिन’
कहानी चन्द्रशेखर की क्या थी
जवानी अलफ्रेड़ पार्क की कर,
लाल धरन को खून से सींचा है……

सर पग नींचे कभी न झुकाया
आगे ही आगे बढ़ाया कूद गये रण में सर,
बाँध कफन को खून से सींचा है……

वीर उधम के पिस्टल का फायर
जिसने लन्दन में मारा था
ड़ायर दहला दिया गोलियों से,
नील गगन को खून से सींचा है……

सुखदेव ने जान गँवायी
फाँसी राजगुरू ने भी खायी
शान्त कर दिल में लगी,
तेज अगन को खून से सींचा है……