आये न नज़र, नादान बशर

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आये न नज़र, नादान बशर

तर्ज – जाने न नज़र……

आये न नज़र, नादान बशर,
तेरे दिल में प्रभु समाया।
ना देख उसे तू पाया,
ना देख उसे तू पाया।

वो ही है सागर ख़ारों में,
है ओस की ठंडी फुवारों में
ना जान सचिन ‘सारंग’ पाया,
ये हीरा जन्म गंवाया ना देख
उसे तू पाया आये न नज़र……

गंगा यमुना की धारों में,
ढूंढ़ो ना उसे बाजारों में
हरदम रहता है पास तेरे,
वो कण-कण में है समाया
ना देख उसे तू पाया
आये न नज़र……..

है नूर उसी का तारों में,
वो मौसम की है बहारों में
निश के आँगन में उसने ही,
इस सूरज को दहकाया ना
देख उसे तू पाया आये न नज़र……

हर कली में है हर डाली में,
है बाग़ों की हरियाली में महिमा
है ये उस दाता की,
जो गुलशन को महकाया
ना देख उसे तू पाया आये न नज़र…….