आर्यों के विमर्श हेतू
महर्षि दयानन्द के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने नारा दिया –
“वेदों की ओर लौटो”
“भारत भारतीयों के लिए है”
महर्षि का लगभग सम्पूर्ण साहित्य पढ़ने पर भी मुझे उक्त शब्द कहीँ भी नहीं मिल सके थे। कुछ दिन पूर्व आर्य समाज का इतिहास पढ़ते हुये पता लगा कि उक्त नारे स्वामी जी ने कभी नहीं कहे। अपितु एक पादरी ने उनका मूल्यांकन करते हुये 1892 में लिखे थे।
मेरी दृष्टि से आर्यसमाज को इसकी सत्यता पता होनी चाहिए और महर्षि के नाम से इन नारों को कहकर प्रचारित नहीं करना चाहिए।
निम्न चित्र भारत में अमेरिका से आये उन्हीं पादरी श्री एच. डी. ग्रिसवोल्ड का है। और ये सभी शब्द उनकी लिखी पुस्तक – “इण्डियन ऐवेन्जेकल रीव्यु” में लिखें हैं। इनको डॉ. सत्यकाम जी द्वारा आर्यसमाज का इतिहास भाग -1 में उद्धृत किया गया है।
“पण्डित दयानन्द का उद्घोष था ‘वेदों की ओर वापस चलो’। इस धार्मिक उद्घोष के साथ, स्पष्टतः न सही, यह उद्घोष भी जुड़ा था कि ‘भारत भारतीयों के लिए हैं’। इन दोनों उद्घोषों को साथ मिलाकर देखने पर यह सिद्धान्त सम्मुख आ जाता है कि भारत में धर्म और राजनीतिक प्रभुता दोनों भारतीयों के ही हाथों में रहनी चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि भारत में भारतीयों का अपना धर्म रहे और भारत की प्रभुसत्ता भारतीयों के ही हाथों में रहे। पहले लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि भारत के धर्म में सुधार कर उसके विशुद्ध वैदिक रूप को प्रचलित किया जाए। दूसरे लक्ष्य की प्राप्ति के सम्बन्ध में आर्यसमाज के संस्थापक का यह मत था कि वेदों की विशुद्ध शिक्षाओं को अपना लेने पर भारतीय लोग धीरे-धीरे इस योग्य हो जाएँगे कि अपना शासन स्वयं कर सकें, और इस प्रकार अन्ततोगत्वा उन्हें पूर्ण स्वाधीनता भी प्राप्त हो जाएगी।””
डा० ग्रिसवोल्ड ने ये वाक्य स्वामी जी के देहावसान के केवल नौ साल वाद लिखे।
“The watch-word of Pandit Dayanand was ‘Back to Vedas’. With this religious watch-word another watch-word was implicitly, if not explicitly, combined, namely ‘India for the Indians’. Combining these two, we have the principle, both religious and political that the religion of India as well as the sovereignty of India ought to belong to the Indian people. In other words, Indian religion for the Indians and Indian sovereignty for the Indians. In order to accomplish the first end Indian religion was to be purified by the return to the Vedas. With regard to the second end, the founder of Arya Samaj seems to have taught that a return to the pure teachings of the Vedas would gradually fit the people of India for the self-rule and
that, independence would ultimately come to them.”
H. D. Griswold: Indian Evengelical Review, January, 1892.










