क्यूँ पीता है, बोतल तू
तर्ज – चल सन्यासी मन्दिर में
क्यूँ पीता है, बोतल तू -3
छोड़ दे इसका पीना बन्दे,
वरना तू पछतायेगा,
जीवन में घबरायेगा।
क्यूँ पीता है प्यालियाँ,
क्यूँ खाता है गालियाँ
शीशे वाला पीकर प्याला
नाली में लिट जायेगा क्यूँ पीता है…..
जीवन है ये तेरा सुहाना,
मदिरा का क्यूँ बना दीवाना
तौबा कर ले आज ही प्राणी,
ना इसको हाथ लगाना,
हाँ लगाना बात मान ले
आज ये मेरी, खुशियों में खेलेगा
सच कहता हूँ झूठ नहीं,
ना ‘सचिन’ कष्ट झेलेगा
क्यूँ पीता है……….
क्यूँ करता है तू मनमानी,
मिट जायेगी तेरी निशानी
अपने लबों पे लायेगा ना,
तेरी कोई कहानी,
हाँ कहानी बुरा-बुरा तुझको बोलेंगे,
सारी दुनियां वाले हाथ जोड़कर बोलेंगे
सब, दाता इसे उठाले क्यूँ पीता है……
वचन कटु निकलेंगे स्वर से,
चली जायेंगीं खुशियाँ घर से मिलके
लोग तुझे मारेंगे, आके इधर उधर से,
हाँ उधर से ऐसे जीने से अच्छी तो,
मौत भली होती रे अपनें हाथ से
बुझा रहा क्यूँ, जीवन की ज्योति रे
क्यूँ पीता है……










