हे प्रभु अमृत पिला, मुझको अविद्या से बचा ॥

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हे प्रभु अमृत पिला, मुझको अविद्या से बचा ॥

काम क्रोध, न लोभ मोह, ना वासना में मन लगे

अप्रशस्त जो भाव आए उलटे पाँव सदा भगे

व्यर्थ ना जिन्दगी गँवानी, सत्य मार्ग प्रभु दिखा ॥

लाख चौरासी जनम, प्रभु गोते खाने में लगे

तेरी प्रभुताई इसी में, मुझको तेरी शरण दे

मेरे जीवन की वीरानी ज्ञान पुष्पों से सजा !!

माँगता वर एक ही मन ज्योत भक्ति की जले

प्रीत की नैया तरे पतवार अपने हाथ ले

तू सुधा सागर है स्वामी तृप्त कर दे आत्मा ॥

दी ऋषि मुनियों की ज्योति कर कृपा मुझको भी दे

राह अमृत की चुनी कुछ ऐसा लक्ष्य मुझे भी दे

छोड़ जाऊँ कुछ निशानी जन्म तारो हे पिता ! ॥

(वीरानी) उजड़ी हुई (तृप्त) सन्तुष्ट होना (गोता) जल में डुबकी (लक्ष्य) उद्देश्य

(अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये)

तर्ज : सांग तू माझाच ना