श्मशान की राहों में हमनें

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श्मशान की राहों में हमनें

श्मशान की राहों में हमनें

श्मशान की राहों में हमनें,
चलती एक दिन अर्थी देखी।
बनकर जो आयी थी दुल्हन,
उसकी ही चिता जलती देखी ।।

ज़ालिम है ज़मानें वाले वो,
दुल्हन का खून बहाते जो -2
हमने तो ‘सचिन’ खुद सासू ही,
दुल्हन के प्राण हरती देखी
श्मशान की राहों में……….

हाथों पे रचाकर मेंहदी जो,
बाबुल के घर से आयी थी-2
उसके ही लहू से हमने तो,
ये लाल हुयी धरती देखी
श्मशान की राहों में……….

धन माल नहीं था देने को,
मज़बूर थे वो बेटी वाले-2
कोमल सी दुल्हन की हमनें,
गर्दन पे छुरी चलती देखी
श्मशान की राहों में……..

चंगुल से छुटकर के उनके,
फिर जाके छुपी वो रसोई में-2
दीवार पकड़कर काँपती वो,
हमने आहें भरती देखी
श्मशान की राहों में……….

ले तेल हाथ में मिट्टी का,
सासू भी रसोई में पहुँची-2
जाते ही बदन को जला दिया,
हमनें दुल्हन मरती देखी
श्मशान की राहों में………