उस प्रभु को, अगर भुलाओगे

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उस प्रभु को, अगर भुलाओगे

तर्ज – तुम मुझे यूं भुला न…….

उस प्रभु को, अगर भुलाओगे
याद रखना ये बात सच है
मेरी ज़िन्दगी को,
दुःखी बिताओगे हाँ,
उस प्रभु को, अगर भुलाओगे

कैसी रचना विशाल है
उसकी सारी सृष्टि ये रचना है
जिसकी वो ही जग को
‘सचिन’ चलाता है उसके दर पे ही,
सर झुकाओगे हाँ,
उस प्रभु को…………

सारी दुनिया का वो सहारा है
सारे जग से ही वो तो न्यारा है
कैसे उसको भुला सकोगे भला
भूलकर भी ना, भूल पाओगे हाँ,
उस प्रभु को…….

कैसे संसार ये रचाया है
कोई अब तक ना जान पाया है
सारा संसार है ये घर उसका
कैसे उसके बिन,घर बसाओगे हाँ,
उस प्रभु को…….