समझा था कि हम भी, काबिल हो गये।

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समझा था कि हम भी, काबिल हो गये।

समझा था कि हम भी, काबिल हो गये।
आज सब अरमान, धूमिल हो गये ।।

लाखों में दो चार भी, ढूंढों अगर।
मिलने अब इन्सान, मुश्किल हो गये ।।1।।

असली चेहरे को छिपाकर, फरिश्तों में।
आज कुछ शैतान,शामिल हो गये।।2 ||

गैरों से शिकवा शिकायत,क्या करें।
अपने ही नादान, कातिल हो गये 3

कौन दुखियों की सुने, आवाज को।
‘प्रेमी’ सब पाषाण के, दिल हो गये।।4