विषय वासनाओं में क्यों जिन्दगी बिगाड़े हैं।

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विषय वासनाओं में क्यों जिन्दगी बिगाड़े हैं।

विषय वासनाओं में
क्यों जिन्दगी बिगाड़े हैं।
अपने ही आप अपनी
जड़ों को उखाड़े है।।

साफ सुथरी चादर तेरी
लग न जाये इस पर दाग।
काम कोध, मद, लोभ,
मोह, ईर्षा द्वेष त्याग ।।
लह-लहाता बाग ओ
निर्भाग क्यों उजाड़े है।।1।।

ईश्वर से डरता नहीं
दुनिया से डरता है।
छिप-छिप करके घड़े
पापों से भरता है।।
प्रभु न्याय करता है
तेरी भावना को ताड़े है।।2।।

जिन्दगी का लक्ष भूला
मस्त रंग ठाठ पै।
धोबी का कुत्ता रहा
घर पै ना घाट पै।।
बुराइयों के पाट पै क्यों
धर्म को पछाड़े है।।3।।

कौन है कहाँ से आया
कहाँ पै ठिकाना तेरा।
यह भी न जाना है तो
जाना अनजाना तेरा ।।
लुटा सब खजाना तेरा
प्रेमी दिन दहाड़े है।।4।।