हरा भरा है बाग फलों से लदी हुई है डाली ।
हरा भरा है बाग फलों से
लदी हुई है डाली ।
अपने हाथों मत ना काटे
अरे बाग के माली ।।
खून पसीने से जो पौधे
तूने आज तक सीचें।
रक्षा के लिये तार चहुंदिश
कांटों वाले खींचे।।
सबको एकसा समझा
पौधे जितने ऊंचे नीचे।
लगे हुये अंगूर संतरे सेव
अंजीर और लीचे ।।
तरह तरह के फूल सुगन्धित
पत्तों की हरियाली ।।1।।
देश के कोने कोने में एक
बात कही जाती है।
डायण माता भी अपने
बच्चों को नहीं खाती है।।
लेकिन है अफसोस तेरी
कितनी कैड़ी छाती हैं।
अपने हाथों पेड़ काटते
भी नहीं दहलाती है।।
बनकर के बेदर्द तैने क्यों
आज कुल्हाड़ी उठाली। ।2।।
तेरी यह निर्दयता तुझको
एक रोज दह जागी ।।
बालू की दीवार एक दिन
पानी में बह जागी।
तू नही रहे बुराई भलाई
तेरी शेष रह जागी ।।
एक रोज यह दुनियां सारी
एक स्वर से कह जागी।
छोड़ चला संसार देखलों
दोनों हाथों खाली।।3।।
देश की नैया आज बड़े
खतरे से गुजर रही है।।
दबी दबाई आग आज
दोबारा उभर रही है।
आशाओं की बेलों को एक
चुही कुतर रही है।।
मगर आप कहते हैं देश
की हालत सुधर रही है।
शोभाराम प्रेमी ने शर्म से
नीचे नाड़ झुकाली।।4।










