पाप जुल्म का करना है

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पाप जुल्म का करना है

पाप जुल्म का करना है,
महापाप जुल्म का सहना है।
इसीलिये तो वीरों तुमसे
आज मुझे कुछ कहना है। टेक।

ऋषियों के आदेशों का हर
समय ध्यान करना चाहियें।
वाणी मात्र से भी पापी का
नहीं मान करना चाहिये।
अनायास भूलों का प्रायश्चित
परित्राण करना चाहिये।।

मक्कार विश्वास घाती का,
नहीं इत्मीनान करना चाहिये।
यह एलान करना चाहिये
अब हमें चुप नहीं रहना है।।1।।

जिस आजादी की खातिर,
अपनी बरबादी की हमने ।।
अनगिन आपत्ति व्याधायें
हंस हंस करके ली हमने।
हृदय की प्रचण्ड ज्वाला की
शान्त अश्रु पी पी हमने।

तन मन धन किया जीवन
अर्पण लाज और अस्मत भी हमने।
जिसकी कीमत दी हमने
यह राज्य राम का वह ना है।।2।।

अनाधिकार चेष्टा से ठग
सत्ता सम्भाले बैठे हैं।
अपनी काली करतूतों पर
परदा डाले बैठे हैं।
बगुले भक्त तनके उजले
और मन के काले बैठे हैं।।

समय आ गया दस्युराज
बस मरने वाले बैठे है।
मौत हवाले बैठे हैं,
अब पापों का गढ़ ढहना है।।3।।

गौ आदि उपकारक पशु
जिस राज्य में मारे जाते हों।।
चौराहों पर अबलाओ के
चीर उतारे जाते हों।।

पूंजीपति शौषक की भेट
शोषित बेचारे जाते हों।
न्याय पसन्द धर्म प्रेमी
ऋषि मुनि संहारे जाते हों।।
जहां पाप उभारे जाते हों
यहां खून का दरिया बहना है ।।4।।