कर्म धर्म भूल गया आज का इन्सान है।
कर्म धर्म भूल गया
आज का इन्सान है।
तभी तो दुखों का सिर पर
भयानक तूफान है।
सुख चाहता है मगर
सुखों की ना राह चलता।
आशाओं का पौधा तभी
तो फूलता और नहीं फलता ।।
जाना तो कहीं और ठौर और
कहीं ध्यान है।। 1 ।।
अपनी चाहे भैंष जाये
पड़ौसी का कटड़ा ना रहे।
आठों पहर विचार धारा गलत
सबके मन में बहे ।।
आप सुखी है तो समझा
सुखी सब जहान है।।2।।
मानवता को छोड़ दानवता की
और जा रहे हैं।
बड़े मेंढ़क छोटे छोटे
मेंढ़को को खा रहे हैं।।
चाह रहे हैं सुख फिर भी
गलती यह महान है।।3।।
यदि सुख चाहते हो
ऋषि दयानन्द की बात मानो।
सबकी उन्नति में ही अपनी
उन्नति को जानो ।।
लेकिन शोभाराम इसका
बिल्कुल भी नहीं ध्यान हे।।4।।










