प्राणी सब संसार के हैं (धुन-आये दिन बहार के)
प्राणी सब संसार के हैं
सदस्य एक परिवार के।
आओ सारे भाई मिलकर
प्यार से रहें।। टेक ।।
दुख-सुख इच्छा द्वेष
प्रयत्न विवेक है।
रंग-रूप न्यारे-न्यारे
जीव सब में एक है।।
गिरना व संभलना एक,
जीवन का बदलना एक ।
करें क्यों लड़ाई मिलकर
प्यार से रहें।।1।।
अनेकों ही आये यहाँ
अनकों ही आयेगें।
बारी-बारी आ रहे हैं
बारी-बारी जायेंगे ।।
यह दुनिया आनी-जानी हैं,
फिर कैसी खैचा तानी हैं।
समझ में न आई मिलकर
प्यार से रहें।।2।।
ऊंच नीच घृणा द्वेष
जाती पाती तोड़कर।
प्रेम की बहा दो गंगा
वैर भांव छोड़कर ।।
नर तन यह अनमोल है
इसे पाना नहीं मखौल है।
छोड़ो सब बुराई
मिलकर प्यार से रहें।।3।।
लज्जा भय शंका हों जिसमे
कभी न वह काम करो ।
औरों से जो चाहो तुम
भी वहीं शोभाराम करो।।
यही धर्म का मूल है
प्रतिकूल इसके भूल है।
ऋषियो ने बताई
मिलकर प्यार से रहें।।4।।










