ऋषिवर दयानन्द की लहराई फुलवारी।(धुन-जीजा जी मेरी जीजी है अनाड़ी)
ऋषिवर दयानन्द की
लहराई फुलवारी।
इसे सींचते रहों ||
सबसे पहले बम्बई में
फुलवारी यह लगाई,
फिर थोड़े दिन बाद लाहौर,
बम्बई से पौध मंगाई।
तीन हिस्सों में सारी,
बना दई दस क्यारी,
। ऋषिवर । ।1 ।।
ऋषि के भक्तो ने तन मन
धन देकर करी सुसज्जित,
लता पात फल डाल डाल पर
सुन्दर सुमन सुगन्धित।
देख-देख नरनारी,
प्रभावित हुए भारी, ऋषिवर ।।2।।
देश विदेश ऋषि की नर्सरी से
लगे पौध मंगाने,
विश्व के अन्दर ऋषि वाटिका के
खिले फूल सुहाने।
ड्यूटी आज तुम्हारी लग
न जाये बिमारी, ऋषिवर ।।३।।
आर्य समाज रूपी बगिया में,
आत्म शांति पाने,
पक्षपात को छोड़ के देखों
दुनिया लग रही आने,
शोभाराम प्रचारी बढ गई जिम्मेदारी,
ऋषिवर । ।4।।










