कभी भंवरों में फसें हम

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कभी भंवरों में फसें हम (धुन- कभी गम से मन लगाया)

कभी भंवरों में फसें हम,
कभी लग गये किनारे ।
प्रवाह से चल रहे हैं,
जीवन यू ही हमारे।।

भिन्न-भिन्न योनियों के,
कभी पहन-पहन चौगे।
भोगों को हमने भोगा,
कभी भोगों ने हम भोगे।।

कभी मौत हमसे हारी
कभी हम मृत्यु से हारे।
प्रवाह से चल रहे हैं,
जीवन यूं ही हमारे ।।1।

बचपन कभी जवानी कभी
आ गया बुढ़ापा।
कई बार सारा जीवन इस
भांति हमने नापा ।।
आवागमन में फंसकर
कभी आये फिर सिधारे।
प्रवाह से चल रहे हैं,
जीवन यूं ही हमारे।।2।।

कई बार पहुँच करके,
मंजिल से गिर गये हम।
गिर करके घिर गये हम
उठ करके फिर गये हम ।।
इस कर्म श्रृंखला के बन्धन में
बन्द सारे। प्रवाह से चल रहे हैं
जीवन यूं ही हमारे।।3।।

अल्पज्ञता के कारण
हम दुख भर रहे हैं।
मर-मर के जी रहें हैं,
जी-जी के मर रहे हैं।।
हम शोभाराम प्रेमी
सर्वज्ञ के सहारे ।।4।।