तेरी कैसे जियेगी सन्तान
तेरी कैसे जियेगी सन्तान,
बतइयो नेंक मोइ प्यारी ।।
अपने सुत की कुशल मनावे,
औरन के तू गले कटावे ।।
तनक दया तौकू न आवे।
किनने सिखायौ ऐसो ज्ञान,
गई तेरी मति मारी।। तेरी०
अपने सुत तोइ प्यारे जैसे,
सब जीवन को लागे तैसे।
फिर तू कर्म करे क्यों ऐसे।
लागेगा पाप महान् पावैगी
बहिना दुःख भारी ।। तेरी०
तैने अपने मन में यों जानी,
पशु-पक्षिन की करके हानि ।।
बचें मेरे सुत की जिन्दगानी।
तैनें जानि लियौ है नादान,
जगत कौ पटवारी ।। तेरी०
ऐसे कर्म करै तू मैना,
तो रोवे नित भर-भर नैना ।।
सत्य कहूँ मैं झूठी है ना।
साँची लीजो जान,
बचै न तेरी औतारी।। तेरी०
उनकौ नाश सहज में जाई,
जिनने तू ऐसी बहकाई ।।
स्याने होत महा दुखदाई।
इनकी बात मत मान बनावें
तोय हत्यारी ।। तेरी०
स्यानो होय कर्म फल मेटा,
तो इनको क्यों मरते बेटा ।।
रूकै ना कबहूँ काल झपेटा।
चाहे बनाइये कोऊ थान,
बजे चाहे नित थारी ।। तेरी०
जिन्हें बहिन तू जानै स्याने
नहीं दुष्ट वह तो हैं दाने ।।
दयानन्द की दया से जाने।
इनने ही हिन्दुस्तान की उजाड़ी
सारी फुलवारी ।। तेरी०
बेगि छोड़ इन पाखण्डन
कूँ मती करै तू दुष्कर्मन कूँ।।
रूपराम कह जार करन कँ।
साँची दई बखान,
पिछारी चाहें दीजो गारी। तेरी०










