सविता पिता विधाता
सविता पिता विधाता,
दुरितों को दूर कर दो।
सब भद्र भाव अपने,
जीवन में मेरे भर दो।
दुरितों ने छिनी मेरी,
शुचि प्रेमश्रेय संपत् ।
सब योग क्षेम मेरा,
परिपूर्ण नाथ कर दो।
शक्ति अतुल ‘तुम्हारी,
करुणा थी सबसे न्यारी।
ममता की निज सुगंधि,
मानस में मेरे भर दो।
तुम हो सुधा के सागर,
खाली है मेरी गागर।
वर्षा के सोम वर्षा,
सब रोम कूप भर दो।
पालक पिता तुम्हीं हो,
ममता की मूर्ति माता।
अब गोद में बिठा कर,
वत्सल सुरस से भर दो।
सर्वत्र संकटों में सच्चे
सखा तुम्हीं हो।
दुख द्वन्द दूर करके,
शाश्वत अभय का वर दो।
कोई पूछता है, तनख्वाह कितनी है।
कोई पूछता है बैंकों में रूपया कितना जमाया है।
कोई पूछता है बड़े साहब के बंगले पर
डाली भेज, क्या खिताब, क्या इनाम पाया है
सब कुछ पूछते प्रकाश, ये न पूछे कोई
धर्म-धन प्रभु-प्रेम कितना कमाया है।










