वन्दना की तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !

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वन्दना की तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !

वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !
हे प्रभुजी !
कर दो पावन आत्मा, मन, बुद्धि
धारा पावन तेरी बहती
मलिनताएँ धोकर रहतीं
प्रेरित शक्ति तेरी रहती
जिस दिशा चलते
हे इन्दु सिन्धु !
आनन्द में रमते
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !

नीचे की ओर जैसे नदी
कल कल बहती
वैसे ही आनन्द स्रोत से
आती स्फूर्ति
सही दिशा में, चलने का वेग
पाती है मन की संकल्प-शक्ति
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !

संकल्प है बड़ा प्रबल
हर काम में
मन नहीं लगता है
फिर आराम में
हो जाती है मन से
कर्तव्यों की पूर्ति
स्फूर्ती में आ जाते हैं मन-बुद्धि
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !

कर रहा हूँ मैं यह अनुभव
हे प्यारे परमेश !
आनन्दमय कोष है
धारा प्रवेश
हर कोष को वह
सरस कर रही है
अङ्ग-अङ्ग इन्द्रियाँ पुलकित हुईं
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !

प्रज्ञा मेरी, मन-वाणी भी,
लगे पाने ज्योति
आनन्दरस की इनमें छाई मस्ती
हुई न्यूनताएँ नष्ट
हर लिए सारे कष्ट
करने लगीं अनुभव अन्त:शक्ति
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !

हे प्रभुजी ! दिव्य रस की
बहा दो धाराएँ
पी पी के इनको हम
अमर हो जाएँ
इनमें नहाकर हम
होवें निर्मल
बनाओ आनन्दी हमें
आनन्दी !
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !
हे प्रभुजी !
कर दो पावन आत्मा, मन, बुद्धि
वन्दना की
तेरा स्तोता बनके प्रभुजी !