हे सहसावन् !! माहिन भगवन् !!
हे सहसावन् !! माहिन भगवन् !!
तुम ज्ञान-बलों के अधिपति
तेरी महिमा अनुभव करता हूँ
मैं पाऊँ शरण तेरी
हे सहसावन् !! माहिन भगवन्!!
माँगना चाहूँ पर क्या माँगूँ ?
नहीं है योग्यता
समझते हो योग्य तो
हे अनुभवी ! दे दो पात्रता
मोल ना समझा तो
कर दूँगा कहीं ना कहीं क्षति
तेरी महिमा अनुभव करता हूँ
मैं पाऊँ शरण तेरी
हे सहसावन् !! माहिन भगवन्!!
आ गया अभिमान धन का
कैसे होगी उन्नति ?
इसलिए मैं माँगूँ धन
यज्ञरूप जो होवे सति
मैं तो पाना चाहूँ
तेरे पूजित धन की आहुति
तेरी महिमा अनुभव करता हूँ
मैं पाऊँ शरण तेरी
हे सहसावन् !! माहिन भगवन्!!
भली प्रकार से जानते हो
क्या है मार्ग विकास का
हर तरफ कल्याण हो
ऐश्वर्य हो वह प्रकाश का
उन्नति हेतु ही देना
लाभ, हे करुणानिधि !!
तेरी महिमा अनुभव करता हूँ
मैं पाऊँ शरण तेरी
हे सहसावन् !! माहिन भगवन्!!
दे दे अपना चित्र-धन
जो तेरे गुणों से हो चित्रित
दिव्य रूप हो आहुति प्रेरक
सत्व-तत्व से हो निर्मित
जिससे हो देवत्व, बल का
ज्ञानरूप हे रयिपति !!!
तेरी महिमा अनुभव करता हूँ
मैं पाऊँ शरण तेरी
हे सहसावन् !! माहिन भगवन्!!
तुम ज्ञान-बलों के अधिपति
तेरी महिमा अनुभव करता हूँ
मैं पाऊँ शरण तेरी
हे सहसावन् !! माहिन भगवन्!!
तुम ज्ञान-बलों के अधिपति
तेरी महिमा अनुभव करता हूँ
मैं पाऊँ शरण तेरी
हे सहसावन् !! माहिन भगवन्!!










