हे ईश ! सब सुखी हों
हे ईश ! सब सुखी हों
कोई न हो दुखारी
सब हों नीरोग भगवन्
धन-धान्य के भण्डारी
सब भद्र-भाव देखें
सन्मार्ग के पथिक हों
दुखिया न कोई होवे
सृष्टि में प्राणधारी
प्रभु नाम के सिमरन को
दिल से न जुदा करना
मस्ती भरे हृदय से
नित ओ३म् जपा करना
देवत्त्व का गुण मन को
सरसब्ज बनाता है
ईश्वर का भजन मन के
सन्ताप मिटाता है
नित ईश भजन कर के
पापों से बचा करना
दुर्भाव दुरित मन में
बेदार न हो जायें
जीवन के सुनहरे पल
बेकार न हो जायें
दल-दल से गुनाहों
की नित दूर करना
ओझल हो न नजरों से
जो लक्ष्य है जीवन का
मारग मिले मुक्ति का
और अन्त हो बन्धन का
ए “भारती” जीवन में
सुपथ पर चला करना










