विश्व भर में विश्वधर सी

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विश्व भर में विश्वधर सी

विश्व भर में विश्वधर सी,
महानता कोई नहीं
उस के निर्मल ज्ञान में,
अज्ञानता कोई नहीं

उस की ताकत उसके जलवे,
तुम किसी से पूछ लो
शक्ल सूरत से उसे,
पहचानता कोई नहीं

नाम तो दुनियाँ ने उसके,
रख दिये हैं अनगिनत
असल में वह कौन है,
यह जानता कोई नहीं

वेद के उपदेश थे,
आचरण करने के लिए
सुन सभी लेते हैं लेकिन,
मानता कोई नहीं

काम रह जाते हैं दुनिया,
के अधूरे इस लिए
करके दम लेंगे यह दिल में
ठानता कोई नहीं

सत्य में है झूठ कितना
यह पता कैसे लगे
अकल की छन्नी में

जब तक छानता कोई नहीं 

हर बशर है भीगता,
दु:ख दर्द की बरसात में
“पथिक” शुभ कर्मों का छाता,
तानता कोई नहीं

विश्व भर में विश्वधर सी,
महानता कोई नहीं
उस के निर्मल ज्ञान में,
अज्ञानता कोई नहीं