सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
जगा दो मन में सद्वृत्ति
सत्य की देखें चमत्कृति
यह शुभ चिन्तन व शुभ निश्चय की
उन्नत होवे चित्तवृत्ति
करें हम दूर क्षुद्रकृति
है बैठा जो अन्दर अनृत
है दुश्चिन्तन में वह सम्वृत
वो रोके यज्ञभावों को सतत्
श्रेष्ठ कर्म करे विस्मित
सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
जगा दो मन में सद्वृत्ति
सत्य की देखें चमत्कृति
यह कहता है असुर
क्या श्रेष्ठ कर्म का
ठेका लिया है आज
करें जो यज्ञ तो कहता है
धन क्यों करते हो बर्बाद
सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
जगा दो मन में सद्वृत्ति
सत्य की देखें चमत्कृति
जो खोलें पाठशाला वेद की
तो हँसी उड़ाते हैं
फौज में भर्ती होने पर कहे
क्यों मरने जाते हैं?
सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
जगा दो मन में सद्वृत्ति
सत्य की देखें चमत्कृति
तो सोचा, मन को समझाया
सुनो सच, चल तो सत्य-पथ पर
असुर अनृत का कर दें संहार
भगा दें शत्रु कह कह कर
सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
जगा दो मन में सद्वृत्ति
सत्य की देखें चमत्कृति
होवें परिपक्व ऐ साथियों !
चारु-सुदृढ़ कर ले मन अपना
लोहा लेने असद्वक्ता से
कस लें कमर भिड़ जाएँ हम
सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
जगा दो मन में सद्वृत्ति
सत्य की देखें चमत्कृति
यह शुभ चिन्तन व शुभ निश्चय की
उन्नत होवे चित्तवृत्ति
करें हम दूर क्षुद्रकृति
सुनृत अनुकाम की प्रभुजी
जगा दो मन में सद्वृत्ति
सत्य की देखें चमत्कृति










