हे अम्बे माँ !! हृदय में तू समा
हे अम्बे माँ !!
हृदय में तू समा
हमें भगवती की चेतना से
भाग्यवन्त बना
सुसंस्कारों के बीज वपन कर
प्रेरणा की धाराओं में
मन को लहरा
हे अम्बे माँ !!
किया है आत्मनिरीक्षण
तो यह लगा
हम पे अनार्ष ग्रन्थों का
ऐसा पड़ा परदा
अप्रशस्त ज्ञान लेके
कर्म में पड़ा
सच्ची उपासना का
रास्ता भी दूर हुआ
मूर्ति-वनस्पति को
मान लिया ईश्वर
मानव समाज इस तरह से
भटक गया
हे अम्बे माँ !!
मन और आत्मा
बने हुए मरुस्थल
तू सरस्वती की मञ्जुल
बहा धार प्रबल
तू दिव्य देवी है कि
तुझ में ईश-प्रेरणा
सुसंस्कारों की तू
बहती हुई नदियाँ
निज पयोधरों से
दिव्य अमृत बहा
पशुता से बचाकर
मानव से देवता बना
हे अम्बे माँ !!
हृदय में तू समा
हमें भगवती की चेतना से
भाग्यवन्त बना
सुसंस्कारों के बीज वपन कर
प्रेरणा की धाराओं में
मन को लहरा
हे अम्बे माँ !!










