हे वरणीय !! महाप्रभु वरुण !!
हे वरणीय !! महाप्रभु वरुण !!
अनन्त महाज्ञानी हो तुम
तुमसे ना कोई बात छुपी
सर्वत्र तेरी सत्ता रही
तुमसे ना कोई क्षण है ओझल
दृष्टि अगण है, है रक्षण
हे वरणीय !! महाप्रभु वरुण !!
नभ में उड़ते पंछियों की
गतिविधि पर है तेरी नज़र
नौकायें सागर में चल रही
दृष्टि तेरी है यात्रियों पर
बारह महीने सम्वत्सर के
जो हो उत्पन्न उसकी खबर
वर्ष-वर्षों के पल छिन दिन
गिने हुए हैं अङ्गुल पर
वरुण की दृग्भू दृष्टि से
ना कोई बच सके प्राणी जन
हे वरणीय !! महाप्रभु वरुण !!
अनन्त महाज्ञानी हो तुम
देखो सदागति वायु है अदृश्य
आँखों से ना देख सके हम
अदृश्य से अदृश्य पदार्थ
पारदर्शक हैं उसके नयन
जड़ चेतन तत्व सकल ब्रह्माण्ड के
चाहे स्थिर हो या हो चलन
हस्ताकमलवत् वरुण ही जाने
उसके अवस्था का ये क्रम
ऐसा सर्वज्ञ सर्वावगाही
रक्षण करता है वह वरुण
हे वरणीय !! महाप्रभु वरुण !!
अनन्त महाज्ञानी हो तुम
भली-बुरी हर सोच हमारी
या हमारे हों कर्म सकल
हैं यदि वे सत्य पथ पर
धृतवत वरुण करते सफल
और यदि व्रत भञ्ज भङ्गुर हो
भोगना होगा दण्डित फल
कोई छुपा चाहे सिन्धु या नभ में
ना वरुण से है ओझल
हे मेरे आत्मन् !! व्रतपति के
व्रतानुसार हो तेरा चलन
हे वरणीय !! महाप्रभु वरुण !!
अनन्त महाज्ञानी हो तुम
तुमसे ना कोई बात छुपी
सर्वत्र तेरी सत्ता रही
तुमसे ना कोई क्षण है ओझल
दृष्टि अगण है, है रक्षण
हे वरणीय !! महाप्रभु वरुण !!










