भोग तृष्णा है प्रबल,कर रहे हैं दखल
भोग तृष्णा है प्रबल
कर रहे हैं दखल
सत्य क्यों तज दिया
भोग में धंस गया
जीवन हुआ विकल
लोग प्रलोभन खल
इन्द्रियाँ गई ढ़ल
लूट रहा है
तन मन और धन
चिन्तन मनन-दुर्बल
भोग तृष्णा है प्रबल
लोभ में जब हो व्याप्त मन
इसमें ना तू हो आसन्न
वेदोपदेश को कर धारण
कर विशेष विवेक ग्रहण
बाह्य आकर्षण भोग-विलास
इसमें व्यर्थ ना कर जीवन
ओ३म् ही तेरा सच्चा धन
लगा ओ३म् में अपना मन
दृढ़ निश्चय से रह नियम में
विष-विषय हो विफल
भोग तृष्णा है प्रबल
हे सुधी विज्ञ आत्मन्!
श्रेय मार्ग पर धर कदम
पग तेरे हों अतिपन्न
दूर हों प्रलोभन
स्वार्थपरता से नित हटकर
लोकहित के मार्ग पर
दानियों का सङ्ग कर
भोग स्वार्थी दान कर
चमक आच्छादित ना देख तू
अन्दर-स्वर्णिम स्थल
भोग तृष्णा है प्रबल
आदित्य मण्डल की प्रभा
पूर्णपुरुष ने दी फैला
ओ३म् नाम है उसका प्रसिद्ध
सत्ता उसकी है सिद्ध
ध्यान-धारणा उसकी कर
केन्द्रित हो निदिध्यासन पर
ओ३म् नाम ही सदा सिमर
जन्म मरण से हो प्रतर
मानव चोले का लक्ष्य यही है
तू बन जाना सबल
भोग तृष्णा है प्रबल
कर रहे हैं दखल
सत्य क्यों तज दिया
भोग में धंस गया
जीवन हुआ विकल
लोग प्रलोभन खल
इन्द्रियाँ गई ढ़ल
लूट रहा है
तन मन और धन
चिन्तन मनन-दुर्बल
भोग तृष्णा है प्रबल










