मानव चोले को पाकर भूला क्यों भगवान् को

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मानव चोले को पाकर भूला क्यों भगवान् को

मानव चोले को पाकर
भूला क्यों भगवान् को
आखिर दुनिया से जाना
इक दिन नादान को

दौलत से भरे खजाने
तुझको बक्षे दाता ने
उसको न जानता
जिसकी ये काया माया
जिसकी ये सुन्दर छाया
उसको न मानता
हीरा सा जनम गंवाया
लानत इन्सान को
आखिर दुनिया से जाना
इक दिन नादान को

पंछी जलचर चौपाये
ईश्वर ने सभी बनाये
तेरे हित के लिए
तीर और कमान लेकर
छुप-छुप निशान लेकर
मारे, गिरा दिये
पीछे छोड़ा है इसने
अब तो “शैतान” को (1)
आखिर दुनिया से जाना
इक दिन नादान को

भाई का गला काटता
अपनों का खून चाटता
मानवता ना रही
निर्बल की खाल उतारे
निर्धन चुन-चुन कर मारे
दानवता छा रही
कालिमा खुद ही
लगाई अपनी शान को
आखिर दुनिया से जाना
इक दिन नादान को

जीवन बदल जायेगा
जो तू संभल जायेगा
भक्ति की राह से
जो तू संवर जायेगा
निश्चय ही तर जायेगा
सागर अथाह से
पाले “बेमोल” कुछ तो
वेदों के ज्ञान को
आखिर दुनिया से जाना
इक दिन नादान को

मानव चोले को पाकर
भूला क्यों भगवान् को
आखिर दुनिया से जाना
इक दिन नादान को