हे मानव धर्म, करो शुभ कर्म

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हे मानव धर्म, करो शुभ कर्म

हे मानव धर्म, करो शुभ कर्म,
सुखों की खान बताई है।
मगर पापों, की छाया से,
पुण्य की हान बताई है।।टेक।।

नियम पालन भी करने को,
तो आगे जब कभी आया।
धीरता धार लई मन में,
पथिक धोखा नहीं खाया।
क्षमा का गुण, हो जीवन में,
दया मन शान बताई है।।1।।

इंद्रियां भोग विलासी हैं,
दमन विषयों का तू करना।
प्रभु है देखता सबको,
काम चोरी से तू डरना।
हो आसक्ति, बिना ही भोग,
वेद की जान बताई है।।2।।

पालन करना ब्रह्मचर्य,
सभी सद्गुण जगाता है।
पवित्रता युक्त हो जीवन,
कुबुद्धि को भगाता है।
वरद वरदान, सच का ज्ञान,
सही पहचान बताई है।।3।।

ईर्ष्या द्वेष से भरकर,
क्रोध अग्नि बढाता है।
शमन कर ले तू जल्दी ही,
मति बुद्धि जलाता है।
बात को मान, कर ले ध्यान,
आस बलवान बताई है।।4।।

धर्म के दस लक्षण कहते,
मनु जी ने गिनाए हैं।
कभी हिंसा नहीं करना,
सभी ग्रन्थन बताए हैं।
करो आनंद, ताराचंद,
जो “मनहर” तान बताई है।।5।।