छाई निराशा की घटा

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छाई निराशा की घटा

छाई निराशा की घटा,
अज्ञान का तम बढ़ रहा है।
हर राह पर हर द्वार पर
दीपक जलाने जा रहे हैं।।
चल सको तो साथ चल दो।
दे सको तो आत्मबल दो।।

ग्रहण सूरज को लगा है,
उजालों ने मुँह छुपाया।
पूर्णिमा को कर अमावस,
असुर कोई खिलखिलाया।।

एक से ही लग रहे हैं
सांझ क्या और क्या सवेरे।
चित्र सब आधे अधूरे,
सो रहे बेसुध चितेरे।।
हर गांव में हर शहर में
एक गुल खिलाने जा रहे हैं।
चल सको तो साथ चल दो।
दे सको तो आत्मबल दो।।

घरोंदों की लाश पर
उठती हुई अट्टालिकाऐं।
जिन्दगी को जहर देकर
मरण के उत्सव मनायें।।
झुकी कटि धंसते उधर
और आंख पथराव हुई है।
ये कलाकृतियाँ कुबेरों की ही
बनवायी हुई हैं।।
सुनसान में वीरान में बस्ती
बसाने जा रहे हैं
चल सको तो साथ चल दो।
दे सको तो आत्मबल दो।।

फुटपाथ जिनका वतन है,
फुटपाथ ही है घर नगर।
पेट तक ही जा रही बस
जिन्दगी की हर डगर।।
दूध आंचल में न जिसके
आंख में पानी नहीं है।
उसे जननि का सृजन
जिसकी पीर अनजानी रही है।।

फुटपाथ को हर हाथ को
सपना दिखाने जा रहे हैं।
चल सको तो साथ चल दो।
दे सको तो आत्मबल दो।।

सोगईं शहनाइयां दहशत भरे
बम के धमाके।
डरती परछाइयां भी मृत्यु दे
कब कौन आके।।
गूंजतीं किलकारियां आंगन
वे सुने हो गए हैं।
महकती थीं क्यारियां उपवन
घिनौने हो गए हैं।।
हर कली को हर फूल को
विश्वास देने जा रहे हैं।
चल सको तो साथ चल दो।
दे सको तो आत्मबल दो।।

पंथ मत मजहब लड़ाते
आ रहे इंसान को।
भूल मानव धर्म बंटते
बांटते भगवान को।।
वेद का पढ़ना पढ़ाना
धर्म है सबसे बड़ा।
संसार का उपकार करना
कर्म है सबसे बड़ा।।
हर मनुज को हर दनुज को
गीता पढ़ाने जा रहे हैं।
चल सको तो साथ चल दो।
दे सको तो आत्मबल दो।।

चिपके हुए धृतराष्ट्र बैठे
सिंहासनों पर सर्प से।
मौन बैठे हैं पितामह
सिर झुकाये शर्म से।।
चक्रव्यूह रचे हुए हर
राह पर हर मोड़ पर।
अभिमन्यु सोए बेखबर
कुण्ठा की चादर ओढ़कर।।
हर धर्म का हर कर्म का
किस्सा सुनाने जा रहे हैं
चल सको तो साथ चल दो।
दे सको तो आत्मबल दो।।