मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मेरी ओर तू भी तो ध्यान दे
मेरे मन में जो अन्धकार है
मेरे ईश्वर मुझे ज्ञान दे
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
चाहे दुःख की रैन मिले तो क्या
चाहे सुख की भोर खिले तो क्या
पतझड़ में भी जो खिला रहे
मैं वो फूल बन के रहूँ सदा
जो लुटे न फीकी पड़े कभी
मुझे वो मधुर मुस्कान दे
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मेरी ओर तू भी तो ध्यान दे
तेरी आरती का दिया बनूँ
यही है मेरी मनोकामना
मेरे प्राण तेरा ही नाम ले
करे मन तेरी ही आराधना
गुण-गान तेरा ही मैं करूँ
मुझे वो लगन भगवान् दे
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मुझमें है राग द्वेष भी
निन्दा पराई मैं करूँ
अहंकार को प्रभु हर लो तुम
मुझे दिव्यता का दान दो
तेरा रूप सब में निहारु मैं
तेरा दर्श सबमें किया करूँ
मुझे वो नजर भगवान् दे
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मेरी ओर तू भी तो ध्यान दे
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मेरी ओर तू भी तो ध्यान दे
मेरे मन में जो अन्धकार है
मेरे ईश्वर मुझे ज्ञान दे
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ
मैं तो कब से तेरी शरण में हूँ










