दिव्य गुणों से करता रहता

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दिव्य गुणों से करता रहता

दिव्य गुणों से करता रहता
दूत कर्म को दाता ईश्वर
करता निज गुण धर्म उजागर
बैठा हृदयासन पर भीतर
दिव्य गुणों से करता रहता

ज्ञान स्त्रोत अद्वितीय बहता
दिव्य सन्देश को प्राप्त कर आता
वासना शून्य हृदय में बैठा
ज्ञान सुकर्म का बोध कराता
अतिदिव्य गुण कर्म और स्वभाव को
साधक लाते मन के भीतर
दिव्य गुणों से करता रहता

प्रभु सन्देश भक्त को देते
प्रेरक ज्योति मन में भरते
दैविक गुण कर्म और स्वभाव से
पावन भृत-भक्तों को करते
भक्त भी तो भगवान् भजन में
सुख पाते सही जीवन जीकर
दिव्य गुणों से करता रहता

बोध-ज्ञान देता साधक को
रहते जो सन्सार में ऐसे
तैर रही हों जल की बूँदें
पड़ी कमल के पत्र पर जैसे
निरासक्त प्रभु-आश्रित रहते
चाहे पड़ा हो मार्ग में कीचड़
दिव्य गुणों से करता रहता
दूत कर्म को दाता ईश्वर
करता निज गुण धर्म उजागर
बैठा हृदयासन पर भीतर
दिव्य गुणों से करता रहता