प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे

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प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे

प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे
चित्त एकाग्र करें
मन में ध्यान करे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे

शब्द सुने कर्ण इत-उत भागे
रूप ध्यान भी आँखें भटका दे
शब्द रूप यदि संयम करे
मन भटका दे – दु:ख भी बढ़ा दे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे
चित्त एकाग्र करें
मन में ध्यान करे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे

ज्ञान वात-रहित प्रगटा दे
मन को स्थिरता का ध्यान करा दे
तन्मय ज्योति का दीपक जले
स्थिरता पा के संयम ला के
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे
चित्त एकाग्र करें
मन में ध्यान करे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे

हे प्रभु! ध्यान तेरा हो कैसे?
नाम एकाग्रता से ही लेके
ज्ञान-कर्मेंद्रियां हैं साधन
साधना साधे, ज्योति रस पा के
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे
चित्त एकाग्र करें
मन में ध्यान करे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे

संध्योपासना का मन ले के
ज्योतियाँ सुव्यवस्था को देखे
मुँह दिखाने के लायक रहूँ
सत्कर्मों के – मार्ग सुझा दे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे
चित्त एकाग्र करें
मन में ध्यान करे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे

ज्ञान-कर्मेंद्रियाँ बनें ज्योति
ईश-साधना हो सर्वोपरि
वरना क्या दूँगा प्रभु को जवाब
आँख से आँख प्रभु से मिला के
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे
चित्त एकाग्र करें
मन में ध्यान करे
प्रभु ज्योत हृदय की जगा दे