खोज लिए धरती आकाश
खोज लिए धरती आकाश
और अन्त:स्तल सागर में उतरे
खोज ना पाए आत्मा को
आत्मज्ञान से रहे विमुख रे
खोज लिए धरती आकाश
और अन्त:स्तल सागर में उतरे
आत्मप्रेमी जो होता सच्चा
भेद-भाव को देता त्याग
ऊँच-नीच ना लाता मन में
कष्ट दु:खों को देता मात
स्वअङ्ग सम बन जाता हितैषी
परहित पर रहती नज़रें
खोज लिए धरती आकाश
और अन्त:स्तल सागर में उतरे
ज्ञान जो चाहे आत्मतत्व का
ज्ञानी-ऋषियों का सङ्ग कर
ईश्वर में विश्वास हो अनमिट
उसके प्रति ना कोई भ्रम कर
छोड़ भटकना जग में इत-उत
आत्मा हो प्रभु में ही रत रे
खोज लिए धरती आकाश
और अन्त:स्तल सागर में उतरे
दुराचारी चञ्चल व प्रमादी
प्राप्त न कर सकता आत्मा
ईर्ष्या-द्वेष न स्वार्थ प्रभावित
आत्मा को देता यातना
आत्मवन्त ही केवल पाए
प्रभु के प्रेम का अमृत रस रे
खोज लिए धरती आकाश
और अन्त:स्तल सागर में उतरे
खोज ना पाए आत्मा को
आत्मज्ञान से रहे विमुख रे
खोज लिए धरती आकाश
और अन्त:स्तल सागर में उतरे










